शनिवार, 22 मार्च 2014

















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मजबूरी का नाम महात्मा गांधी
बचपन से सुनता आया हूँ लेकिन कब रजिस्टर्ड हुआ पता नहीं ,
नेहरू की प्रदर्शनी गांधी हो गई
बाद में गांधी खानदानी डिवीजन हो गई किसीको मलाल नही
देश जोड़ने वाला नाम पटेल हुआ
पटेल अब स्टेचू ऑफ़ यूनिटी होगया , इस पर कोई सवाल नहीं
मौत का सौदागर नाम दिया
फिर भी मजबूती का नाम मोदी होगया , ये कमाल है के नहीं
केजरीवाल आईटम नम्बर होगया
आईटम डांसर बोला तो धरना देगा , फिर मत बोलना बताया नहीं
#सारस्वत
22032014 

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

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साईकल से उतर कर राजू आ गया
बैंड बाजा लेके बप्पी लैहरी आ गया
हाथ हिलाता जगदम्बिका आ गया
साथ में सतपाल महाराज आगया
लालू के घर से राम कृपाल आ गया
रामविलास गिरगिट रंगीन आ गया
लहर है देश में आज मोदी के नाम की
आलू बैंगन तरकारी समभाव आ गया
#सारस्वत
21032014 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

"इश्क का धरना"

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इश्क नाम उस अराजकता का है
जिसका दावा है बदलाव आएगा
आहें भरते घर तक पीछा करना
ख़ुशफैहमी का समाजवाद लाएगा
हकीकत से रुबरु करेगा अगर कोई
दिल दीवाना धरने पर बैठ जायेगा
जात-पात का अड़ंगा मत लगाना
वरना ये मरने-मारने पे उतर आएगा
बेशर्मी का झंडा बुलन्दी को छुऐगा
तबेही कम्बख्त-इश्क कहलायेगा
धड़कनें फड़कती रहें दुआ करना
एक रोज़ इंकलाब जरुर आएगा
#सारस्वत
14032014

बुधवार, 12 मार्च 2014

"पिताजी"

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एक दृढ व्यक्तित्त्व 
प्रकाशपुंज के समान 
पिताजी 
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मेरे जीवन की पृष्ठभूमि
उच्च आदर्शों के प्रतिबिम्ब
व्यवहारिक प्रेरणाश्रोत
मेरे जीवन के मार्ग-दर्शक
पिताजी
प्रकाशपुंज के समान
पिताजी
*
जिंदगी की धूप की तपिश से
परिचय करवाना मात्र सख्ती
कडक आवाज के पीछे
मकसद मेरी स्थापना
पिताजी
प्रकाशपुंज के समान
पिताजी
#सारस्वत
12032014

सोमवार, 10 मार्च 2014

"नेताजी"


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नेताजी
हमारे राजनीती के बड़े खिलाडी हैं
हर एक फण्डा आजमा कर देख लेते हैं
स्वार्थ सिद्धि का नाम ही तो है नेतागिरी
सारे जोड़ तोड़ वो बिठा कर देख लेते हैं
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नेताजी तो
सियासत के मंजे हुऐ अर्थशास्त्री ठैहरे
राजनीतिक पल्टियाँ दूर से देख लेते हैं
चुनाव से ठीक पैहले तो जाती धरम का
हिसाब किताब भी फैला कर देख लेते हैं
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नेताजी के
कितनी हवा है खिलाफत में सियासत में
सारा नुक्सान जोड़ घटा कर देख लेते हैं
जिसका साथ हो साथ में उसका हिसाब
नफे की किताब में बिठा कर देख लेते हैं
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नेताजी को
बार बार दल बदलने का कोई शौक नहीं है
बस कुर्सी का शौक सत्ता का स्वाद लेते हैं
सियासत कुत्ती शै है ये बात खूब जानते है
इसीलिए तो इस महकमें को खुद देख लेते हैं
#सारस्वत
10032014 

शनिवार, 8 मार्च 2014

"स्त्री सम्मान"








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एक दीप ज्ञान का, एक दीप ध्यान का
एक दीप आशा का, स्त्री सम्मान का
गहरी ऊष्मा से भरपूर , एक जलधारा
रेगिस्तान सहारा , गहरे नाभि-नाल का
ममतामई बिबं प्रतिबिंब , आदर्श प्रतिमा
एक सरोवर , चिर नवीन प्रार्थनाओं का
पूर्वाग्रहों से मुक्त , एक चुपचाप  सड़क
ह्रदयस्पर्शी रूपअन्नंत , संवेदनाओं का
ग्रह-नक्षत्रों पर , एक बूंद की तलाश में
जीवन खपा देने वाली , एक प्यास का
एक दीप विश्वास का , जीव पहचान का ,
एक दीप आशा का, स्त्री सम्मान का,
#सारस्वत
08032014 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

महिला "उम्मींद के आँसू" दिवस

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चटकने की आवाज ' पथरीले शब्दों से.....
उखड़ती सांसों पे ' तयशुदा निशानों से.......
हम हैं प्रतीक्षा में , नींद में ऊँघते..
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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विद्रोह के नक़्शे ... स्मृतियों की वर्जनाएं '
घर की सीलन... मुखर आर्तनाद ;
जाल में फंसे … छटपटाते शिकार ,
भेद डाले - दूब चिन्ह ,
तोड़ डाले - लज्जा के भाव '
चलो नोच डालते है उम्मीदें ...
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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छातीयों को पीटते ' उच्च स्वर विलाप...
भाषा के विलोपन में ' भाषा का चमत्कार ;
बातें सी सीढियां , शब्दों सी आग ...
तिलिस्मी सी रचनाऐं ...
सब अय्यारी ..प्रभाव ,
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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रेत ग़या , वह स्वर्ण युग...
मौन मुखर शब्द तलवार , ज्वाला शस्त्रागार ...
बातें जों बदलतीं ' चित्रों सी , मनमाफिक रंगों सी...
बंद कर दिए - मरुथली रास्तों के छोर.......
ढांप दिए उजालों के - तमाम रोशनदान........
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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चलो ओढ़ लेते हैं - हम भी मातमी लिबास
जिनके सुर मिलते हैं ..ठहाकों , सलीबों से '
शोकगीत..गातें हैं , झुके सिर पर मुस्कुराते हैं ;
क्षुब्ध ज्वालाओं क़ा तर्पण करते हैं.......
चलो कुछ देर और वेश बदलते हैं..........
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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समय हुआ - तो भूल गए रिश्ता
समय हुआ - तो साथ गए बंधे रिश्ते जैसा
मुझमें काँटे उगते हैं - केवल उसको चुभते हैं
रहा बंधा रिश्ता खूंटे के जैसा .....
मेरा जीवन चौपाये जैसा
चलो नोच डालते है उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
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खुली किताब के ये कुछ सबूत , खारे पानियों में बहा देते हैं ;
उलझी व्यस्तताओं की लटों में , राहत की चंद सांस लेते है......
खुली आँखों से रखते हैं ; दो मिनट के प्रायोजित मौन '
और... फिर ' गर्वित सहलाते हैं - पुनर्जीवन के चिन्ह
शवयात्रा के वैभव का गुणगान...... 'पीड़ा के आख्यान'
चलो नोच डालते हैं बची उम्मीदें ..
संकेतों की प्रतीक्षा में ...
#सारस्वत
07032014