मंगलवार, 19 मार्च 2019

शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...

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चुनाव सर पर आ गया तो , नतीज़े भी रुझान के आने लगे हैं 
भक्त लेने लगे हैं मौज़ , चमचों को डकारें खट्टी आने लगी हैं 
शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. 
शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...
आज सत्ता के गलियारों , कुछ ऐसी सच झूठ में लगी पड़ी है
बढ़ने लगा है शुगर का लेविल ,गालियां वैरायटी में आने लगी है 
शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. 
शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...
कंजर खाने का शातिर है मटरू ,ढिल्ली दिल्ली का सरताज़   
वाट लगी है ऐसी उसकी ,ना भी लगभग सुनाई देने लगी है 
शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. 
शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...
चलेगा कोई भी गुंडा चोर मवाली , सीट जिताऊ नेता चाहिये 
लगे मटकने दलबदलू सारे , थाली के बैंगनों में होड़ लगी है 
शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. 
शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...
वोट तो आखिर वोटर का ठहरा , और वोटर कोई क्यों लेगा लोड 
शौर किया चौरों ने जबसे , जनता खुदको चौकीदार कहने लगी है 
शारारारा !. बोलो शारारारा !!.. 
शारारारा !!!. बोलो बोलो शारारारा !!! ...
#सारस्वत 
19032019

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

ये तुम नहीं जानते ...


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जानता हूँ
जब तुम मुस्कुराते हो
छलकते आंसूं छिपाते हो
तब देखता हूँ
पलकों में वो आंसूं
नमी को छोड़ जाते हैं
ये तुम नहीं जानते
कुछ जख्मों का ईलाज़
वक़्त के सिवाय
कोई दूसरा
नहीं कर सकता 
सोच कर बस यही
कर देता हूँ
देखकर भी अनदेखा
ये तुम नहीं जानते
#सारस्वत
06022016

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

बचपन के दिन

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बचपन के दिन !
बचपन की याद !!
बचपन की साथ  !
बचपन की बात !!
फिर से निकल जाते थे ..
खेलने ..
घंटों उधम मचाते ..
गिल्ली डंडा कंचे ..
जाने क्या-क्या .. 
खेलने के बाद भी ,
कमबख्त ..
बच ही जाता था समय ,
चुगली करने का ..
लड़ने झगड़ने का ..
फिर रात का सफर ..
गैहरी नींद के साथ ..
दोस्ती ,
सपनीले ख्वाबों से .
बचपन की बात !
बचपन की याद !!
#सारस्वत 
22102013

मंगलवार, 1 जनवरी 2019


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खोने को रोज़ एक दिन खो देता हूँ 
पाने को एक नया दिन पालेता हूँ 
खोने को रोज़ खोता हूँ मैं खुद को 
पाने को रोज़ नाक़ामी पालेता हूँ 
कुछ भी नही बदला सब रोज़ सा 
वही दिन का आना रात का जाना 
सुभहा शाम गम से गप्पे लड़ना 
ना कुछ नया पाया ना ही खोया 
सिवाय इस गुजरते हुऐ वक्त के 
जो गया साँसों से वापस ना आया 
खुद का पता नही खुदा का क्या कहूँ 
दहशत ना वहशत बस जिऐ जा रहा हूँ 
14022014

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

# उसने पूछा ... अब क्यों लाईन में खड़ा है शहर मैंने कहा ... ये सत्ता बदल के बाद का है कहर उसने पूछा ... क्या ? चौकीदार चौर था यहां भी अजी नहीं ... अफ़वाह पे फ़िदा हो गया था शहर
29122018

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

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दिलों के बीच ... नफरत का ज़हर बोने वालो  
बू - खुशबू ऐ मोहब्बत  ... फैलाओ तो जाने 
गंजी आँखों में ख़ंजर  ... तोबा शिकन तुम्हारे 
कभी , काज़ल ख़्याल का ... लगाओ तो जाने 
जलाकर कंदील ... साज़िश , नई रोज़ करने वालो 
महफ़िल , कभी मोहब्बत की ... सजाओ तो जाने  
फिर वही !! वफ़ा के नाम पर , बेवफ़ा की बातें 
कभी क़िस्सा ऐ एतबार  ... सुनाओ तो जाने 
जब से देखा है  ... चाहत की ताड़ी पिये बैठा हूँ 
आशिक़ हूँ , गैर नहीं ... गले से लगाओ तो जाने
#सारस्वत 
18072017

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

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तुम कोई काम करोगे या नहीं मुझे आज बता दो  ... 
सुमन ने कमरे में घुसते हुये अपने पति उदयवीर से कहा 
सुबह सुबह उल्हना शुरू हो गया तुम्हारा  ... 
थोड़ा रुककर उदयवीर ने बोलना शुरू किया  ... 
तुम और तुम्हारा बेटा रात ही तो बोल रहे थे ,
मैं किसी काम को ठीक से नहीं करता हूँ तो ...
अब किस काम की उम्मीद रखती हो मुझसे  ... 
दो महीने से ऊपर हो गया कमरे का शीशा टूटे हुए , 
रोज कहती हूँ मगर मजाल है जो सुनाई पड़ता हो आपको 
अरे मैं भी तो तुम्हारे सुपुत्र को रोज़ बोलता हूँ साथ चले मेरे खरीदकर लाऊंगा  ... 
वह ही नहीं चलता तो उसमें मेरी गलती नहीं है 
वो नहीं जाता तो तुम चले जाओ ना .. तुम क्यों बहाने ढूंढ़ते हो काम ना करने के 
किस लिए जाऊं ... 
फिर जो तुम मंहगा खरीद कर लाये का ताना देती हो उसका क्या 
इसी बहस के साथ सुमन उदयवीर को 500 रूपये देकर 2 शीशे लाने को कहती है 
उदयवीर सबसे पहले उस दुकानदार के पास के पास जाता है शीशों का साइज़ लेकर क्योंकि 2 साल पहले उसी की दुकान से शीशे आये थे मगर उस के पास में यलो कलर वाले शीशे नहीं मिलते तो वह उदयवीर  को दूसरी दुकान का पता देता है जो की वहां से काफी दूर थी तब रिक्शा से उदयवीर जाता है मगर वह भी सेम कलर नहीं मिलता तब उदयवीर पैदल ही कुछ दूर जाता है तो उदयवीर को अपना बेटा दिखाई देता है वह उससे शीशे लाने के लिए साथ चलने को बोलता है मगर बेटा कॉलेज से थककर आने की बात बोलके मना करदेता है , अब उदयवीर खुद ही शहर में सेम कलर का शीशा ढूंढ़ता है कभी रिक्शा तो कभी पैदल चलता है जिसमे उसे तीन चार घंटे लगते हैं , और आखिर में उदयवीर जब घर में आता है शीशे का हिसाब देने लगता है तब एकबार फिर सुनने को मिलता है ऐसा किस की दुकान से खरीद लाये इतना मॅंहगा खरीदकर लाने की क्या जरुरत थी  ... और बेटा हिसाब लगाने के लिए कैलकुलेटर लेकर बैठ जाता है  ... ये सब आज पहली बार नहीं हो रहा था उदयवीर के साथ में पहले भी कई बार होता आया था पचपन की उम्र के पार उदयवीर की जब से नौकरी छूटी थी  तब से बेरोजगार उदयवीर के साथ में यही सब होता आ रहा था अब दूकानदार से पूछताछ करने की बात हो रही थी इसीकी वजह से उसने घर के काम करने बंद कर दिए थे आज भी वही सब हो रहा था। ... बेरोजगार आदमी की घर में कुत्ते बराबर औकात नहीं रहती यह उदयवीर को अच्छे से समझ आ गया था  ... बस इस समस्या से बहार निकलने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था 
#सारस्वत 
20122018