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बुधवार, 13 जून 2018

यूँ ही ...

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कुछ कह रहा हूँ तुमसे  ... सुनो बस यूँ ही
पलकों की ओढनी से  , वो मुस्कुराई दी यूँही 
समय रुक सा गया , नैनो में उलझ कर के 
रुको !! जरा सा तुमभी ठहरो कुछ देर यूँ ही 
एक तुम्हारे दम पर ही , जीता हूँ हमदम 
ना होती तो , हार जाता सब कुछ यूँ ही 
सुनो जब जब कहता हूँ ... सुना है कुछ 
 बोलता है डर अंदर का , तब तब  यूँही 
खुद से अकेले में ... कुछ भी तो नहीं हूँ 
अकेला एक मैं नहीं , तुम भी हो यूँ ही 
आस उम्मीद ... अपनेपन का एहसास 
लौ विश्वास की , जलती रहती है यूँ ही 
समझ रही हो ना ... क्या कुछ कह रहा हूँ 
अभी पूछा भी ना था , वो मुस्कुराई दी यूँही 
#सारस्वत 
13062018

बुधवार, 6 जून 2018

आरजू ...

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आरजू हसरत आहें , तमन्ना मुराद उम्मीद 


सभी कुछ निचुड़ा हैं ' यारा , तेरे जिक्र के आगे 


आज भी हैं बरकरार ... सब कुछ ज्यूँ के त्यूं


गिला शिकवा शिकायतें ... मोहब्बत के धागे 


वस्ल की आरजू लिए ... हालेदिल तमाम 


जाने कितने !!! खत लिख डाले  बिना नागे 


ख्वाइश के हाथों हुए हैं ... अरमान कई जवां 


लगे मेंहदी अरमानों को ... तो माने भाग जागे 


#सारस्वत
06062018

बुधवार, 30 मई 2018

यादें ...




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यादों से बेहतर यादों से बदतर कोई बंदिश नहीं होती 
बजने लगती है तो गीत गज़ल से कमतर नहीं होती 
जब बरसती हैं तो बह निकलता है आबसार दरिया का 
आके बैठ जाता है वक्त चुपके से कोई आहट नहीं होती 
छू लेना चाहता है फिर हर एक चीज जी जी में आता है 
औ' जो मुह को आता है उसकी कोई मंजिल नहीं होती 
चाहे वो शहर ऐ यार का गम हों या फिर हों ख़ुशी उसकी 
छलकती है पलकों से तो कमी कोई नमी की नहीं होती 
मायूसी हो या हो इत्मीनान , वफ़ा हों या फिर बेवफाई
ख़्वाब हक़ीक़त झूठ और सच हद की सरहद नहीं होती 
निशांनात खंजर के चमकते हैं यूँ रूह पर नश्तर बनके  
इश्क की बिदाई में तन्हाई होकर भी तन्हा नहीं होती 
रात भर साथ बरसात सा मेला लगा रहता है यादों का 
सुभह की रोनकों में दफन हादसों की गिनाई नहीं होती 
#सारस्वत 
30052018

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

सर ...

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सरेपाँव आदमकद इंसान को ,

जब कोई सर कहकर सम्बोधित करता है । 

तिलक चापलूसी का ,

अभिमान की पताका को महिमामंडित करता है । । 

सर के सर का वजूद कुछ भी नहीं ,

अगर धड़ की सुराही पर टिका ना हो ।  

जानता समझता है फिर भी ,

सर का सर गर्दन हिलाकर अनुमोदित करता है । । 

#सारस्वत

24112017

शनिवार, 9 सितंबर 2017

नज़र ...

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नज़र ने नज़र से नज़र को जो मारा 
दिल ही दिल में दिल देके दिल हारा 

हटी भी ना थी नज़र हवा में घुल गया 
बन कर खुशबु फ़िज़ा में इश्क बेचारा 

नज़र ना आये तो धड़कता है ये दिल 
जब आया नज़र में धड़कनों ने मारा 

इश्क में आशिक ने इश्के ईबादत में   
मांगी इतनी सी दुआ हो मिलना दोबारा

ख़ैर की खबर नहीं तो सुकून भी नहीं   
नज़र से मिले नज़र तो बदला नज़ारा  
#सारस्वत 
10092015

रविवार, 3 सितंबर 2017

रिस्ते हुए रिश्ते

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रिश्तों में रिश्ते रिसने लगे हैं 
पलकों में पलके पीसने लगे हैं 
फ़िक्र है फ़िक्र की फिक्रमंद हूँ मैं 
नज़र में नज़र के नज़रबंद लगे हैं 
दुआ में दुआ सा वो असर अब नहीं 
दुआओं की दीवारों पे ज़ाले लगे हैं 
ज़िक्र के ज़िक्र में हुआ ज़िक्र ख़ामोश 
अक़्स नक्स ज़ुल्फ़ें जब उतरने लगे हैं 
दाव पर लगा दी यहां तमाम ज़िन्दगी 
दावेदार अभीतक आज़माने में लगे हैं 
दिलों में दिलों के अब मोहब्बत नहीं है 
धुंये की शकल में सब सिरहाने लगे हैं 
#सारस्वत 
06022013 

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

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मिलना किसी रोज़  ... 
मिलना तुम , ऐ जिंदगी फुर्सत के साथ में 
देखना !!
क्यों नहीं मिलती , मोहलत जिम्मेदारी के साथ में 
प्यासे को पानी  ... 
खुद पीना पड़ता है , बस  इतना समझ लो 
निवाला !!
तलक नहीं जाता , खुद चल कर  मूंह के पास में 
मिलते तो हैं  ...
इस दुनियां के लोग , चाहे मतलब से मिलते हैं 
वैसे !!
वक्त ही कहाँ मिलता है , यहाँ कभी वक्त के साथ में 
आसान तो यहाँ पर  ...
कुछ भी नहीं है , जिंदगी जीने के वास्ते 
जीतकर !!
हारा हूँ रोज़ , झूठसच की लड़ाई में बड़ाई के साथ में 
#सारस्वत 
01092017