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मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

जिंदगी … चार दिन की



#
जिंदगी  …
चार दिन की ,
कितनी दूर जानी थी
खर्च  …
हो जानी थी ,
खर्च हो गई एक दिन
#
बाकी  …
अब बस यादें हैं हवा में
और  …
बातें हैं यादों में बाकी
जो  …
हवा थी , जिस्म में दौड़ती
कैद से …
हवा हो जानी थी एक दिन
वो  …
हवा , हवा हो गई एक दिन
जिंदगी  …
चार दिन की   …
#
प्राणी  …
मिटटी का दुनियाँ पीर पराई
बंधन  …
रिश्ते नाते सुख दुःख राम दुहाई
मिटटी को  …
खाक हो जाना था किसी दिन
मिटटी  …
जा मिली आखिर मिटटी से
और  …
राख हो गई एक दिन
जिंदगी  …
चार दिन की   …

#सारस्वत
28102014