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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

आईने के सामने

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अपने आप से मिलता नहीं हूँ , मैं आईने के भी सामने
पता नहीं कब किस बात पर , शर्मिंदा कर दे ये मुझे

बातें होती नहीं मेरी खुद से , अब अपने आप से कभी
मशवरे फ़ालतू के आज कल , अच्छे नहीं लगते मुझे
पता नहीं कब किस बात पर ....

किसकी फ़िक्र करूँ बता , खुद की या तेरी नाराजगी की
तूने ही तो सिखाया था कल , मतलब का मतलब मुझे
पता नहीं कब किस बात पर ....

नई रौशनी लेकर चलता हूँ , अब साया नजर नहीं आता
यही इलाज था इसका  , हर वक़्त टोकता था ये मुझे
पता नहीं कब किस बात पर ....

बेशर्मी का राज क़ायम है , अब सल्तनत ऐ ज़मीर पर
हाँ हाँ ' कर ले मुलाकात ईमान , आकर डरा ले अब मुझे
पता नहीं कब किस बात पर ....
#सारस्वत