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शनिवार, 9 जनवरी 2016

दर्द के साथ में

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सोचता हूँ
चोट दिल पर लगी ज़ख्म गैहरे तक गये
चीस को सींचते निशान नासूर बन गये
दर्द को बंद कर दूँ किसी कनस्तर में
और लगा दूँ डांट पर टांके पीतल के
मर जाये मरदूद वहीं पर फांके के साथ में

लेकिन , दर्द भी अकेला नहीं है यहां
हमदर्द कई दर्द लिए साथ में खड़े हैं
लड़ने भिड़ने को कंधे से कंधा अड़ाए
रिश्ते नाते दावेदार सभी चढ़े पड़े हैं
खामोशी है उदासी है तन्हाई है दर्द के साथ में

और गहरे  ...  देखता हूँ
ख़ीज की चिपकी हुई काई है
कुंठा की सूखी हुई पत्तियाँ हैं
फूँस का ढेर सुलग रहा है निरंतर
तड़प है जलन है तपन है इस दर्द के साथ में

दिन बेस्वाद सा घुटन भरा सा
रात भटकाव लिये चुपचाप सी
यादों की बस्ती दूर तक फैली हैं
जख्मीं किस्सों की गडमड रैली है
मुकम्मल इंतजामात हैं यहां दर्द के साथ में

चारो तरफ ही नज़र दौड़ता हूँ मैं
हर मोड़ पर ठिठक जाता हूँ मैं
नज़र कोई आता नहीं दूर भी जाता नहीं
किसको चुन लूँ किसको जाकर पकडूँ
किसको डालूं कनस्तर में दर्द के साथ में

रौशनी में भी रौशनी नज़र आती नहीं कोई
दम कितना घुटता है इसका माप नहीं कोई
एहसास की तपीश लिए अकेला जलता हूँ
दरारों से गिरता है रिस्ता है लावा झरता है
उठता है धुंआँ खुदबखुद में दर्द के साथ में

सुना है तैय शुदा है मौत सबकी , मगर  …
दर्द की मौत भी नहीं आती जनता हूँ
आँखे रोती है तो दरिया फूट पड़ता है
बरसात का मौसम वरदान में मिला है
पीप से रिसते हैं रिश्ते इसी दर्द के साथ में
#सारस्वत
10042015