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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

ग़म का लिहाफ़ ओढ़ कर

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ग़म का लिहाफ़ ओढ़ कर ग़म , सुकून की नींद निचोड़ा करते हैं
सपनें आते हैं कुछ खुशियां लेकर , जिन को हम बटोरा करते हैं

नई सुभह के साथ में अंगड़ाई , मुस्कराहट की लेकर उठना तुम
उदासी के दीये को जलने दो , सूर्य किरण पर यही सकोरा करते हैं

टूटी हुई खिड़कियों से कैहदो , चंदन रातों में कोई जौरशौर ना करें
थके हारे झोंके यहां आकर , अक्सर आराम का थोरा करते हैं

कल पूछूंगा तबियत से हाल , कैसी गुजरी रात बरसात के साथ
बेफिक्री से सोना अभी तुम , हम छत टपकने पर कटोरा करते हैं

#सारस्वत
11082015