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बुधवार, 9 सितंबर 2015

शांति की ख़ोज निरंतर जारी है


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अंतर्मन मंथन की यात्रा पर है 
शांति की ख़ोज निरंतर जारी है 
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कभी शब्दों को शब्द नहीं मिलते 
कभी ओठ चाहकर नहीं खुलते 
अकाल पर अकाल भारी हैं 
शांति की ख़ोज  ...
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रिश्तों के रिश्ते रिस्ते हुये बंधन 
फिरभी विषधर लपेटे वृक्ष है चंदन 
तृष्णा बुँदे भी पलकों पर आरी हैं 
शांति की ख़ोज  ...
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तेज़ बिखराया है धूपिया रंगों में 
दर्द समाया है रेत के टीलों में 
मरुस्थल में मृगतृष्णा तारी है 
शांति की ख़ोज  ... 
#सारस्वत 
09092015