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शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

जय हिंद - जय भारत















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सोचता रहता हूँ अक्सर
खत्म हो जाये अगर
दंगो के जख्मों के निशान
मिट जाएँ फ़ासले
मिट हो जायें ये सब दूरियाँ
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एक  तरफ से आवाज आये - हर हर महादेव
दूसरी तरफ से जवाब आये - अल्लाह हो अकबर
मुस्कुराकर दोनों गले मिले , रोज़ की तरहा से
हाल पूछा खुशहाली का , आज फिर कल की तरहा से
कुछ देर साथ बैठे , ठण्डी हवा पीपल की छाँव तले
गली कूचे चौबारे साथ में , गलबहियाँ करने लगे
सोचता रहता हूँ अक्सर
खत्म हो जाये अगर
दंगो के जख्मों के निशान
मिट जाएँ फ़ासले
मिट हो जायें ये सब दूरियाँ
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ना तमंचे से बारूद निकला , ना तलवार घुसी किसी के अंदर
ना दिवार से पत्थर बरसे , ना भगदड़ मची शहर के अंदर
ना किसी ने फतवा जारी किया , ना किसी ने शखनाद किया
ना लाल के खून से लाल हुई धरती , ना नारी को शर्मिंदा किया
ना मजहब ने भौं सिकोड़ी , ना ही धर्म ने की आँखें चौड़ी
मजबूत खड़ी रही , मन्दिर मस्जिद में अमन शांति की जोड़ी
सोचता रहता हूँ अक्सर
खत्म हो जाये अगर
दंगो के जख्मों के निशान
मिट जाएँ फ़ासले
मिट हो जायें ये सब दूरियाँ

जयहिंद
जय भारत
इन्कलाब जिंदाबाद
 वन्देमातरम
#सारस्वत
15121991