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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

क्या लिखूं ?















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पशोपेश में हूँ 
खुद में उलझा हूँ 
क्या लिखूं ?
कुछ भी लिखने से पैहले
ख्याल
अपने शहर की तरफ चला जाता है
क्या से क्या बन गया है
हस्ता खेलता शहर सुलगने लगा है
ये कैसी फिजा बैह रही है
जो नफरतों के बीज बो रही है
ऐसे तो ये कभी
सीधा खड़ा नही हो सकेगा
नफरत की बैसाखी के सहारे
आखिर ये कैसे चल सकेगा
दंगो ने शहर को
व्हीलचेयर पर पंहुचा दिया
हाथ पैर नाक कान आंख मुँह
वाला शहर
मेरी तरहा ही विकलांग हो गया है
मैं तो शरीर से ही विकलांग था
लेकिन मेरा शहर आज
हिन्दू मुस्लिम में बट गया है
मानसिक विकलांग हो गया है
#सारस्वत
10092013